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mahabharat 8.90.52: श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! जब तुम खाण्डव वन में हाथ में धनुष लेकर अग्निदेव को संतुष्ट कर रहे थे, तब यही सर्प अपनी माता के मुख में प्रवेश कर गया था और अपने शरीर की रक्षा करके आकाश में उड़ रहा था। तुमने इसे एक सर्प समझकर इसकी माता को ही मार डाला था।   |   mahabharat अध्याय 8.90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  8.90.52 
कृष्ण उवाच
योऽसौ त्वया खाण्डवे चित्रभानुं
संतर्पयाणेन धनुर्धरेण।
वियद्‍गतो जननीगुप्तदेहो
मत्वैकरूपं निहतास्य माता॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! जब तुम खाण्डव वन में हाथ में धनुष लेकर अग्निदेव को संतुष्ट कर रहे थे, तब यही सर्प अपनी माता के मुख में प्रवेश कर गया था और अपने शरीर की रक्षा करके आकाश में उड़ रहा था। तुमने इसे एक सर्प समझकर इसकी माता को ही मार डाला था।
 
Shri Krishna said- Arjun! When you were satisfying Agnidev with a bow in your hand in Khandav forest, this same snake had entered its mother's mouth and was flying in the sky after protecting its body. You had killed only its mother thinking it to be a single snake.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)