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mahabharat 8.90.47-48h: कर्ण ने कहा- सर्प! आज कर्ण दूसरों के बल का सहारा लेकर युद्धभूमि में विजय प्राप्त नहीं करना चाहता। सर्प! यदि मैं सौ अर्जुनों को भी मार डालूँ, तो भी एक ही बाण को दो बार नहीं मार सकता।   |   mahabharat अध्याय 8.90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 47-48h
 
 
श्लोक  8.90.47-48h 
कर्ण उवाच
न नाग कर्णोऽद्य रणे परस्य
बलं समास्थाय जयं बुभूषेत्॥ ४७॥
न संदध्यां द्वि: शरं चैव नाग
यद्यर्जुनानां शतमेव हन्याम्।
 
 
अनुवाद
कर्ण ने कहा- सर्प! आज कर्ण दूसरों के बल का सहारा लेकर युद्धभूमि में विजय प्राप्त नहीं करना चाहता। सर्प! यदि मैं सौ अर्जुनों को भी मार डालूँ, तो भी एक ही बाण को दो बार नहीं मार सकता।
 
Karna said— Snake! Today Karna does not want to win the battleground by taking the help of others' strength. Snake! Even if I can kill a hundred Arjunas, I cannot hit the same arrow twice. 47 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)