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mahabharat 8.90.42: अंशुमाली, जो सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सवार था, जो स्वयं अपने द्वारा उत्पन्न बाणरूपी पुत्र के रूप में प्रकट हुआ था और गौ द्वारा रक्षित था, जो नेत्रेन्द्रियों से कानों का कार्य लेने के कारण गोकर्ण (आँखें: श्रवा) और मुख से पुत्र की रक्षा करने के कारण सुमुखी कहलाती है, उस सर्प ने घोड़ों की लगाम के आगे (चलने पर भी, रथ नीचा होने के कारण) तेज और ओज से प्रकाशित अर्जुन के मस्तक को लक्ष्य करके (उसे न पाकर) उसी मुकुट को छीन लिया, जिसे स्वयं ब्रह्माजी ने इन्द्र के मस्तक पर सुशोभित करने के लिए सुन्दर रूप से सजाया था और जो सूर्य के समान किरणों के तेज से जगत् को परिपूर्ण करने वाला था। अर्जुन ने उक्त सर्प को अपने बाणों से कुचलकर, उसे पुनः आक्रमण करने का अवसर न देने के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ॥42॥   |   mahabharat अध्याय 8.90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  8.90.42 
गोकर्णा सुमुखी कृतेन इषुणा
गोपुत्रसम्प्रेषिता
गोशब्दात्मजभूषणं सुविहितं
सुव्यक्तगोऽसुप्रभम्।
दृष्ट्वा गोगतकं जहार मुकुटं
गोशब्दगोपूरिवै
गोकर्णासनमर्दनश्चन यया-
वप्राप्यमृत्योर्वशम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
अंशुमाली, जो सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सवार था, जो स्वयं अपने द्वारा उत्पन्न बाणरूपी पुत्र के रूप में प्रकट हुआ था और गौ द्वारा रक्षित था, जो नेत्रेन्द्रियों से कानों का कार्य लेने के कारण गोकर्ण (आँखें: श्रवा) और मुख से पुत्र की रक्षा करने के कारण सुमुखी कहलाती है, उस सर्प ने घोड़ों की लगाम के आगे (चलने पर भी, रथ नीचा होने के कारण) तेज और ओज से प्रकाशित अर्जुन के मस्तक को लक्ष्य करके (उसे न पाकर) उसी मुकुट को छीन लिया, जिसे स्वयं ब्रह्माजी ने इन्द्र के मस्तक पर सुशोभित करने के लिए सुन्दर रूप से सजाया था और जो सूर्य के समान किरणों के तेज से जगत् को परिपूर्ण करने वाला था। अर्जुन ने उक्त सर्प को अपने बाणों से कुचलकर, उसे पुनः आक्रमण करने का अवसर न देने के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ॥42॥
 
Anshumali, which was ridden by Karna, the son of Surya, who appeared herself in the form of an arrow-shaped son produced by herself and protected by the cow, which is called Gokarna (eyes: Shrava) because of taking the function of ears from the eye organs and Sumukhi because of protecting the son with the mouth, that serpent aimed the head of Arjuna, glowing with brightness and vitality, in front of the bridle of the horses (despite walking, the chariot being low, she After not getting it, he took away that very crown, which Lord Brahma himself had beautifully decorated to adorn Indra's head and which was supposed to fill the world with the radiance of sun-like rays. Arjuna, who crushed the said snake with his arrows, did not succumb to death because he did not give it a chance to attack again. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)