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mahabharat 8.90.29-31: उस प्रज्वलित बाण को बड़े वेग से आते देख भगवान श्रीकृष्ण ने मानो युद्धभूमि में खेलते हुए अपने उत्तम रथ को पैरों से दबाकर उसके पहियों का कुछ भाग भूमि में धंसा दिया। उसी समय चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत वर्ण वाले और स्वर्ण आभूषणों से आच्छादित उनके घोड़े भी भूमि पर घुटने टेककर बैठ गए। उस समय आकाश में चारों ओर से महान कोलाहल गूंज उठा। सहसा भगवान मधुसूदन की स्तुति में कहे गए दिव्य शब्द सुनाई देने लगे। श्रीमधुसूदन के प्रयत्न से जब रथ भूमि में धंस गया, तब भगवान पर दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी और दिव्य गर्जना भी सुनाई देने लगी।   |   mahabharat अध्याय 8.90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 29-31
 
 
श्लोक  8.90.29-31 
तं प्रेक्ष्य दीप्तं युधि माधवस्तु
त्वरान्वितं सत्वरयैव लीलया।
पदा विनिष्पिष्य रथोत्तमं स
प्रावेशयत् पृथिवीं किंचिदेव॥ २९॥
क्षितिं गता जानुभिस्तेऽथ वाहा
हेमच्छन्नाश्चन्द्रमरीचिवर्णा:।
ततोऽन्तरिक्षे सुमहान् निनाद:
सम्पूजनार्थं मधुसूदनस्य॥ ३०॥
दिव्याश्च वाच: सहसा बभूवु-
र्दिव्यानि पुष्पाण्यथ सिंहनादा:।
तस्मिंस्तथा वै धरणीं निमग्ने
रथे प्रयत्नान्मधुसूदनस्य॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
उस प्रज्वलित बाण को बड़े वेग से आते देख भगवान श्रीकृष्ण ने मानो युद्धभूमि में खेलते हुए अपने उत्तम रथ को पैरों से दबाकर उसके पहियों का कुछ भाग भूमि में धंसा दिया। उसी समय चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत वर्ण वाले और स्वर्ण आभूषणों से आच्छादित उनके घोड़े भी भूमि पर घुटने टेककर बैठ गए। उस समय आकाश में चारों ओर से महान कोलाहल गूंज उठा। सहसा भगवान मधुसूदन की स्तुति में कहे गए दिव्य शब्द सुनाई देने लगे। श्रीमधुसूदन के प्रयत्न से जब रथ भूमि में धंस गया, तब भगवान पर दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी और दिव्य गर्जना भी सुनाई देने लगी।
 
Seeing that blazing arrow coming with great speed, Lord Krishna, as if playing in the battlefield, immediately pressed his excellent chariot with his feet and sank some part of its wheels into the ground. At the same time, his horses, white in colour like the rays of the moon and covered with golden ornaments, also knelt down on the ground. At that time, a great uproar resounded in the sky from all sides. Suddenly, divine words spoken in praise of Lord Madhusudana started to be heard. When the chariot sank into the ground due to the efforts of Sri Madhusudana, divine flowers started raining on the Lord and divine roars also started to be heard.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)