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mahabharat 8.9.91-92: संजय! जब पाण्डवों के वीर योद्धा मूसलाधार वर्षा करने वाले मेघों के समान बाणों की वर्षा करते हुए आगे बढ़ने लगे, तब वह श्रेष्ठ बाणों में श्रेष्ठ दिव्य सर्पमुख बाण कैसे व्यर्थ हो गया? यह मुझे बताओ॥91-92॥   |   mahabharat अध्याय 8.9: धृतराष्ट्रका संजयसे विलाप करते हुए कर्णवधका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त पूछना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 9: धृतराष्ट्रका संजयसे विलाप करते हुए कर्णवधका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 91-92
 
 
श्लोक  8.9.91-92 
पाण्डवाश्च स्वयं शूरा: प्रत्युदीयुर्महारथा:।
सृजन्त: शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुदा:॥ ९१॥
स च सर्पमुखो दिव्यो महेषुप्रवरस्तदा।
व्यर्थ: कथं समभवत् तन्ममाचक्ष्व संजय॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
संजय! जब पाण्डवों के वीर योद्धा मूसलाधार वर्षा करने वाले मेघों के समान बाणों की वर्षा करते हुए आगे बढ़ने लगे, तब वह श्रेष्ठ बाणों में श्रेष्ठ दिव्य सर्पमुख बाण कैसे व्यर्थ हो गया? यह मुझे बताओ॥91-92॥
 
Sanjaya! When the valiant warriors of the Pandavas started advancing, showering their arrows like clouds pouring down torrents of rain, how did the divine serpent-headed arrow, the best of all the great arrows, become useless? Tell me this. ॥91-92॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)