Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 8.9.42-50h: जिसे देवराज इन्द्र ने दो कुण्डलों के बदले में एक दिव्य शक्ति दी थी, जो विद्युत के समान चमकने वाली, शत्रुओं का संहार करने वाली, सोने से मढ़ी हुई थी, जिसके तरकश में सदैव सर्प के समान मुख वाला, सोने से मढ़ी हुई, कंकपत्रों वाली तथा युद्ध में शत्रुओं का संहार करने वाली दिव्य बाण रहती थी, जो भीष्म-द्रोण जैसे महारथियों की भी उपेक्षा करता था, जिसने जमदग्निपुत्र परशुराम से भयंकर ब्रह्मास्त्र की शिक्षा ली थी तथा जिसने द्रोणाचार्य आदि को सुभद्रापुत्र के बाणों से पीड़ित देखकर युद्ध से विमुख होकर अपने तीखे बाणों से उनके धनुष को काट डाला था, जिसने दस हजार हाथियों के समान बलवान, वज्र के समान वेग वाले अपराजित योद्धा भीमसेन को अचानक रथ से वंचित करके उनका उपहास किया था, जिसने सहदेव को पराजित करके, मुड़ी हुई गांठों वाले बाणों से उसका रथ छीनकर, धर्म के लिए दया करके उसके प्राण नहीं लिए थे; वह वीर कर्ण युद्धभूमि में कैसे मारा गया, जिसने इन्द्र द्वारा दी गई शक्ति से विजयोन्मादी राक्षसराज घटोत्कच को मार डाला था, जिसने सहस्रों माया रचने वाले को मारा था और जिसके कारण अर्जुन इतना भयभीत था कि इतने समय तक उसके साथ द्वारथ युद्ध में भाग नहीं ले सका था? | mahabharat अध्याय 8.9: धृतराष्ट्रका संजयसे विलाप करते हुए कर्णवधका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त पूछना । mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जिसे देवराज इन्द्र ने दो कुण्डलों के बदले में एक दिव्य शक्ति दी थी, जो विद्युत के समान चमकने वाली, शत्रुओं का संहार करने वाली, सोने से मढ़ी हुई थी, जिसके तरकश में सदैव सर्प के समान मुख वाला, सोने से मढ़ी हुई, कंकपत्रों वाली तथा युद्ध में शत्रुओं का संहार करने वाली दिव्य बाण रहती थी, जो भीष्म-द्रोण जैसे महारथियों की भी उपेक्षा करता था, जिसने जमदग्निपुत्र परशुराम से भयंकर ब्रह्मास्त्र की शिक्षा ली थी तथा जिसने द्रोणाचार्य आदि को सुभद्रापुत्र के बाणों से पीड़ित देखकर युद्ध से विमुख होकर अपने तीखे बाणों से उनके धनुष को काट डाला था, जिसने दस हजार हाथियों के समान बलवान, वज्र के समान वेग वाले अपराजित योद्धा भीमसेन को अचानक रथ से वंचित करके उनका उपहास किया था, जिसने सहदेव को पराजित करके, मुड़ी हुई गांठों वाले बाणों से उसका रथ छीनकर, धर्म के लिए दया करके उसके प्राण नहीं लिए थे; वह वीर कर्ण युद्धभूमि में कैसे मारा गया, जिसने इन्द्र द्वारा दी गई शक्ति से विजयोन्मादी राक्षसराज घटोत्कच को मार डाला था, जिसने सहस्रों माया रचने वाले को मारा था और जिसके कारण अर्जुन इतना भयभीत था कि इतने समय तक उसके साथ द्वारथ युद्ध में भाग नहीं ले सका था?
To whom Devraj Indra had given a divine power in exchange of two earrings, shining like electricity and capable of destroying enemies, decorated with gold, in whose quiver always rested a divine arrow with a face like that of a snake, decorated with gold, having leaves of Kank and which could kill enemies in war, who used to ignore even the great warriors like Bhishma-Drona, who had learnt the dreadful Brahmastra from Jamadagni's son Parshuram and the mighty warrior who, seeing Dronacharya etc., suffering from the arrows of Subhadra's son, turning away from the war, had cut off his bow with his sharp arrows, who had suddenly made a mockery of the undefeated warrior Bhimasena, who was as strong as ten thousand elephants, whose speed was as fast as thunderbolt, by depriving him of his chariot, who after defeating Sahadev, depriving him of his chariot with arrows having bent knots, did not take his life out of mercy for the sake of Dharma; How was that brave Karna killed on the battlefield, who killed the victory-seeking demon king Ghatotkacha, who created thousands of illusions, with the power given by Indra and because of whom Arjuna was so afraid that he could not participate in the Dwaratha war with him for so long?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥