श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 9: धृतराष्ट्रका संजयसे विलाप करते हुए कर्णवधका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  8.9.31 
क्षीण: सर्वार्थहीनश्च निर्ज्ञातिर्बन्धुवर्जित:।
कां दिशं प्रतिपत्स्यामि दीन: शत्रुवशं गत:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं शरीर से दुर्बल हूँ, समस्त धन से रहित हूँ, बंधु-बांधवों और मित्रों से रहित हूँ, शत्रुओं के वश में हूँ, तो मैं दीन भाव से किस ओर जाऊँगा? 31॥
 
If I am physically weak, bereft of all wealth and bereft of my relatives and friends, falling under the control of the enemy, in which direction will I go in a humble mood? 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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