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श्लोक 8.9.10  |
धिग्जीवितमिदं चैव सुहृद्धीनश्च संजय।
अद्य चाहं दशामेतां गत: संजय गर्हिताम्॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| संजय! लानत है मेरी ज़िंदगी पर। आज मैं दोस्तों से वंचित हूँ और इस नीच स्थिति में पहुँच गया हूँ। |
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| Sanjay! Shame on my life. Today I am devoid of friends and have reached this despicable state. |
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