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श्लोक 8.89.97  |
स सर्वत: प्रेक्ष्य दिशो विशून्या
भयावदीर्णै: कुरुभिर्विहीन:।
न विव्यथे भारत तत्र कर्ण:
प्रहृष्ट एवार्जुनमभ्यधावत्॥ ९७॥ |
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| अनुवाद |
| भरत! कौरव योद्धाओं को भयभीत होकर भागते देखकर भी कर्ण को कोई दुःख नहीं हुआ। वह पूर्ण हर्ष और उत्साह के साथ अर्जुन पर टूट पड़ा॥97॥ |
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| Bhaarat! Karna did not feel any pain even after seeing all the directions deserted by the Kaurava warriors who had fled in fear. He attacked Arjuna with full joy and enthusiasm.॥ 97॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनद्वैरथे एकोननवतितमोऽध्याय:॥ ८९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १०२ १/२ श्लोक हैं।) |
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