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स कर्णबाणाभिहत: किरीटी
भीमं तथा प्रेक्ष्य जनार्दनं च॥ ६२॥
अमृष्यमाण: पुनरेव पार्थ:
शरान् दशाष्टौ च समुद्बबर्ह।
अनुवाद
मुकुटधारी कुन्तीपुत्र अर्जुन, कर्ण के बाणों से घायल भीमसेन और भगवान श्रीकृष्ण को देखकर वह न सह सका और उसने पुनः अपने तरकश से अठारह बाण निकाल लिये।
Unable to bear the sight of Arjuna, the son of Kunti, wearing a crown and Bhimasena and Lord Krishna wounded by Karna's arrows, he again took out eighteen arrows from his quiver.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥