| श्री महाभारत » पर्व 8: कर्ण पर्व » अध्याय 89: कर्ण और अर्जुनका भयंकर युद्ध और कौरववीरोंका पलायन » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 8.89.4  | प्रवृद्धशृङ्गद्रुमवीरुदोषधी
प्रवृद्धनानाविधनिर्झरौकसौ।
यथाचलौ वा चलितौ महाबलौ
तथा महास्त्रैरितरेतरं हत:॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे दो पर्वत जिनके शिखर, वृक्ष, लताएँ, झाड़ियाँ और औषधियाँ विशाल और विकसित हैं तथा जो नाना प्रकार के बड़े-बड़े झरनों का स्रोत हैं, उसी प्रकार पराक्रमी कर्ण और अर्जुन आगे बढ़कर अपने महान् अस्त्रों द्वारा एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे। | | | | Like two mountains whose peaks, trees, creepers, shrubs and medicinal herbs are huge and grown up and which are the source of various kinds of big springs, the mighty Karna and Arjuna advanced forward and began attacking each other with their great weapons. | | ✨ ai-generated | | |
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