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mahabharat 8.88.29: वीर! प्रथमतः वे तुम्हारे स्वाभाविक भाई हैं; अतः वे स्वाभाविक मित्र हैं। प्रभु! फिर तुम संधि करके उन्हें अपना मित्र बना लो। यदि तुम पाण्डवों से प्रसन्नतापूर्वक मित्रता स्वीकार कर लो, तो तुम संसार का बहुत कल्याण कर सकोगे॥ 29॥   |   mahabharat अध्याय 8.88: अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 88: अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  8.88.29 
निसर्गतस्ते तव वीर बान्धवा:
पुनश्च साम्ना समवाप्नुहि प्रभो।
त्वयि प्रसन्ने यदि मित्रतां गते
हतं कृतं स्याज्जगतस्त्वयातुलम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
वीर! प्रथमतः वे तुम्हारे स्वाभाविक भाई हैं; अतः वे स्वाभाविक मित्र हैं। प्रभु! फिर तुम संधि करके उन्हें अपना मित्र बना लो। यदि तुम पाण्डवों से प्रसन्नतापूर्वक मित्रता स्वीकार कर लो, तो तुम संसार का बहुत कल्याण कर सकोगे॥ 29॥
 
Veer! Firstly they are your natural brothers; hence they are natural friends. Prabhu! Then you make a treaty and make them your friends. If you happily accept friendship with the Pandavas, then you can do immense good to the world.'॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)