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श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता  »  श्लोक 54-56h
 
 
श्लोक  8.87.54-56h 
देवदानवगन्धर्वा नागयक्षा: पतत्त्रिण:॥ ५४॥
महर्षयो वेदविद: पितरश्च स्वधाभुज:।
तपोविद्यास्तथौषध्यो नानारूपबलान्विता:॥ ५५॥
अन्तरिक्षे महाराज विनदन्तोऽवतस्थिरे।
 
 
अनुवाद
महाराज! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, पक्षी, वेदों को जानने वाले ऋषि, अन्न खाने वाले पितर, नाना प्रकार के रूप और शक्तियों से युक्त तप, ज्ञान और औषधियाँ - ये सभी अंतरिक्ष में खड़े होकर कोलाहल कर रहे थे।
 
Maharaj! Gods, demons, Gandharvas, snakes, Yakshas, ​​birds, sages who knew the Vedas, ancestors who ate food, penance, knowledge and medicines full of various forms and powers – all of them were standing in the space making noise.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)