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mahabharat 8.87.110: जैसे हाथी अपने दाँतों से जंगल में वृक्षों को टुकड़े-टुकड़े कर देता है, वैसे ही आज ही मैं कर्ण को उसके रथ, घोड़े, बल, कवच और शस्त्रों सहित टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।   |   mahabharat अध्याय 8.87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  8.87.110 
अद्यैव सरथं साश्वं सशक्तिकवचायुधम्।
संचूर्णितमिवारण्ये पादपं दन्तिना यथा॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
जैसे हाथी अपने दाँतों से जंगल में वृक्षों को टुकड़े-टुकड़े कर देता है, वैसे ही आज ही मैं कर्ण को उसके रथ, घोड़े, बल, कवच और शस्त्रों सहित टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।
 
Just as an elephant with its tusks breaks a tree into pieces in the jungle, similarly, today itself I shall break Karna to pieces along with his chariot, horse, power, armour and weapons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)