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श्लोक 8.86.23  |
एवमुक्तस्तदा तेन पाण्डवेन महात्मना।
जयेन सम्पूज्य स पाण्डवं तदा
प्रचोदयामास हयान् मनोजवान्।
स पाण्डुपुत्रस्य रथो मनोजव:
क्षणेन कर्णस्य रथाग्रतोऽभवत्॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| महाबली पाण्डुकुमार अर्जुन की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे विजय का आशीर्वाद देकर सम्मानित किया और उस समय मान के समान वेगवान घोड़े बड़े वेग से आगे बढ़े। पाण्डुपुत्र अर्जुन का वह मनोजवरथ क्षण भर में कर्ण के रथ के सामने जाकर खड़ा हो गया। |
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| On hearing this from the great Pandukumar Arjuna, Lord Krishna honored him by blessing him with victory and at that time, the horses, which were as fast as Mana, moved forward at great speed. That Manojvaratha of Pandu's son Arjun went and stood in front of Karna's chariot in a moment. |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनद्वैरथे वासुदेववाक्ये षडशीतितमोऽध्याय:॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अर्जुनके द्वैरथयुद्धके प्रसंगमें भगवान् श्रीकृष्णका वाक्यविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८६॥
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