श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 85: कौरववीरोंद्वारा कुलिन्दराजके पुत्रों और हाथियोंका संहार तथा अर्जुनद्वारा वृषसेनका वध  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  8.85.32-33 
ऊनं च तावद्धि जना वदन्ति
सर्वैर्भवद्भिर्मम सूनुर्हतोऽसौ।
एको रथो मद्विहीनस्तरस्वी
अहं हनिष्ये भवतां समक्षम्॥ ३२॥
संरक्ष्यतां रथसंस्था: सुतोऽय-
महं हनिष्ये वृषसेनमुग्रम्।
पश्चाद् वधिष्ये त्वामपि सम्प्रमूढ-
महं हनिष्येऽर्जुन आजिमध्ये॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मेरा वीर एवं पराक्रमी पुत्र महारथी अभिमन्यु अकेला था। मैं उसके साथ नहीं था। उस समय तुम सबने मिलकर उसका वध कर दिया। तुम्हारे कृत्य को सब लोग मिथ्या कहते हैं; किन्तु आज मैं तुम सबके सामने वृषसेन का वध करूँगा। हे रथसज्जित महारथियों! यदि तुम बचा सको तो अपने इस पुत्र की रक्षा करो। हे अर्जुन! आज मैं युद्धभूमि में पहले महारथी वृषसेन का वध करूँगा; फिर बुद्धिहीन सारथीपुत्र तुमको भी मार डालूँगा।॥ 32-33॥
 
‘My valiant and brave son, the great warrior Abhimanyu was alone. I was not with him. At that time, all of you together killed him. Everyone calls your act a lie; but today I will kill Vrishasena in front of all of you. O great warriors seated on chariots! Save this son of yours if you can. Today, Arjuna, I will first kill the fierce warrior Vrishasena in the battlefield; then I will also kill you, the son of a charioteer who lacks wisdom.॥ 32-33॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas