श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 85: कौरववीरोंद्वारा कुलिन्दराजके पुत्रों और हाथियोंका संहार तथा अर्जुनद्वारा वृषसेनका वध  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  8.85.30-31 
आरक्तनेत्रोऽन्तकशत्रुहन्ता
उवाच कर्णं भृशमुत्स्मयंस्तदा॥ ३०॥
दुर्योधनं द्रौणिमुखांश्च सर्वा-
नहं रणे वृषसेनं तमुग्रम्।
सम्पश्यत: कर्ण तवाद्य संख्ये
नयामि लोकं निशितै: पृषत्कै:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
उस समय क्रोध से उसके नेत्र लाल हो गए थे। वह यमराज जैसे शत्रु का भी वध करने में समर्थ था। उस समय उसने वहाँ उपस्थित कर्ण, दुर्योधन और अश्वत्थामा आदि सभी वीर योद्धाओं से मुस्कुराते हुए कहा - 'कर्ण! आज युद्धस्थल में तुम्हारे सामने ही मैं उस भयंकर एवं पराक्रमी योद्धा वृषसेन को अपने तीखे बाणों से यमलोक भेज दूँगा।'
 
At that time his eyes had become red with anger. He was capable of killing even an enemy like Yamraj. At that time he smiled and said to all the brave warriors present there like Karna, Duryodhan and Ashwatthama - 'Karna! Today in the battlefield, in front of you, I will send that fierce and valiant warrior Vrishasena to Yamaloka with my sharp arrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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