श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 83: भीमद्वारा दु:शासनका रक्तपान और उसका वध, युधामन्युद्वारा चित्रसेनका वध तथा भीमका हर्षोद्‍गार  »  श्लोक 44-49h
 
 
श्लोक  8.83.44-49h 
प्रमाणकोटॺां शयनं कालकूटस्य भोजनम्॥ ४४॥
दंशनं चाहिभि: कृष्णैर्दाहं च जतुवेश्मनि।
द्यूतेन राज्यहरणमरण्ये वसतिश्च या॥ ४५॥
द्रौपद्या: केशपक्षस्य ग्रहणं च सुदारुणम्।
इष्वस्त्राणि च संग्रामेष्वसुखानि च वेश्मनि॥ ४६॥
विराटभवने यश्च क्लेशोऽस्माकं पृथग्विध:।
शकुनेर्धार्तराष्ट्रस्य राधेयस्य च मन्त्रिते॥ ४७॥
अनुभूतानि दु:खानि तेषां हेतुस्त्वमेव हि।
दु:खान्येतानि जानीमो न सुखानि कदाचन॥ ४८॥
धृतराष्ट्रस्य दौरात्म्यात् सपुत्रस्य सदा वयम्।
 
 
अनुवाद
‘मुझे प्रमाणकोटितीर्थ में विष देकर नदी में फेंक दिया गया, कालकूट नामक विष पिलाया गया, काले सर्पों से डसा गया, लाक्षागृह में जलाने का प्रयत्न किया गया, जुए में मेरा राज्य छीन लिया गया और हम सबको वनवास दे दिया गया। द्रौपदी के केश खींचे गए, जो बड़ा ही वीभत्स कृत्य था। युद्ध में मुझ पर बाण आदि घातक अस्त्रों का प्रयोग किया गया और मुझे घर में भी चैन से रहने नहीं दिया गया। राजा विराट के महल में हमें जो महान कष्ट सहने पड़े, वे सबसे अनोखे हैं। शकुनि, दुर्योधन और कर्ण की सलाह से हमें जो भी कष्ट सहने पड़े, उन सबका मूल कारण आप ही थे। धृतराष्ट्र की दुष्टता के कारण हमें अपने पुत्रों सहित ये कष्ट सहने पड़े हैं। हम इन कष्टों को जानते हैं, परन्तु हमें स्मरण नहीं आता कि हमने कभी सुख भोगा हो।’॥44-48 1/2॥
 
‘I was poisoned at Pramankotitirth and thrown into the river, I was fed poison called Kalakuta, I was bitten by black snakes, an attempt was made to burn me in Lakhshagriha, my kingdom was snatched away through gambling and we were all exiled. Draupadi's hair was pulled, which was a very gruesome act. Arrows and other deadly weapons were used on me in the war and I was not allowed to live peacefully even at home. The great suffering we had to endure in the palace of King Virat is the most unique. You were the root cause of all the sufferings we had to endure due to the advice of Shakuni, Duryodhana and Karna. We have had to endure these sufferings along with our sons due to the wickedness of Dhritarashtra. We know these sufferings, but we do not remember ever experiencing happiness.'॥ 44-48 1/2॥
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