श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 83: भीमद्वारा दु:शासनका रक्तपान और उसका वध, युधामन्युद्वारा चित्रसेनका वध तथा भीमका हर्षोद्‍गार  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  8.83.30-31 
स्तन्यस्य मातुर्मधुसर्पिषोर्वा
माध्वीकपानस्य च सत्कृतस्य।
दिव्यस्य वा तोयरसस्य पानात्
पयोदधिभ्यां मथिताच्च मुख्यात् ॥ ३०॥
अन्यानि पानानि च यानि लोके
सुधामृतस्वादुरसानि तेभ्य:।
सर्वेभ्य एवाभ्यधिको रसोऽयं
ममाद्य चास्याहितलोहितस्य॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
‘मैंने माता का दूध, मधु और घृत, मधुका पुष्पों से बने हुए पेय, दिव्य जल का रस, दूध और दही से मथा हुआ ताजा मक्खन आदि सब पीया है या चखा है; इन सब से बढ़कर तथा संसार में अमृत के समान स्वादिष्ट अन्य पदार्थों से भी बढ़कर मेरे शत्रु का रक्त अधिक स्वादिष्ट है॥30-31॥
 
‘I have drunk or tasted mother's milk, honey and clarified butter, well-prepared beverages made from madhuka flowers, the juice of divine water, fresh butter churned from milk and curd; above all these and also other things in the world which are as delicious as nectar, the blood of my enemy is more delicious than all of them.॥ 30-31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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