श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 83: भीमद्वारा दु:शासनका रक्तपान और उसका वध, युधामन्युद्वारा चित्रसेनका वध तथा भीमका हर्षोद्‍गार  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  8.83.28-29 
उत्कृत्य वक्ष: पतितस्य भूमा-
वथापिबच्छोणितमस्य कोष्णम्।
ततो निपात्यास्य शिरोऽपकृत्य
तेनासिना तव पुत्रस्य राजन्॥ २८॥
सत्यां चिकीर्षुर्मतिमान् प्रतिज्ञां
भीमोऽपिबच्छोणितमस्य कोष्णम्।
आस्वाद्य चास्वाद्य च वीक्षमाण:
क्रुद्धो हि चैनं निजगाद वाक्यम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद उन्होंने भूमि पर पड़े हुए दु:शासन की छाती फाड़ दी और उसका गरम रक्त पीने की चेष्टा करने लगे। हे राजन! दु:शासन जब उठने का प्रयत्न कर रहा था, तब वह पुनः गिर पड़ा और अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए बुद्धिमान भीमसेन ने तलवार से आपके पुत्र का सिर काट डाला और उसका गरम रक्त पीकर उसका स्वाद लेने लगे। फिर क्रोध से उसकी ओर देखकर वे इस प्रकार बोले -॥28-29॥
 
After this, he tore open the chest of Dushasan lying on the ground and started trying to drink his hot blood. O King! While Dushasan was trying to get up, he fell down again and in order to fulfil his promise, the wise Bhimasena cut off your son's head with his sword and started drinking his hot blood, savoring it. Then, looking at him in anger, he spoke thus -॥28-29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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