| श्री महाभारत » पर्व 8: कर्ण पर्व » अध्याय 83: भीमद्वारा दु:शासनका रक्तपान और उसका वध, युधामन्युद्वारा चित्रसेनका वध तथा भीमका हर्षोद्गार » श्लोक 25-27 |
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| | | | श्लोक 8.83.25-27  | एवं त्वसौ राजसुतं निशम्य
ब्रुवन्तमाजौ विनिपीडॺ वक्ष:।
भीमो बलात्तं प्रतिगृह्य दोर्भ्या-
मुच्चैर्ननादाथ समस्तयोधान्॥ २५॥
उवाच यस्यास्ति बलं स रक्ष-
त्वसौ भवेदद्य निरस्तबाहु:।
दु:शासनं जीवितं प्रोत्सृजन्त-
माक्षिप्य योधांस्तरसा महाबल:॥ २६॥
एवं क्रुद्धो भीमसेन: करेण
उत्पाटयामास भुजं महात्मा।
दु:शासनं तेन स वीरमध्ये
जघान वज्राशनिसंनिभेन॥ २७॥ | | | | | | अनुवाद | | युद्धभूमि में ऐसा कहकर भीमसेन राजकुमार दु:शासन की छाती पर चढ़ गए और उसे दोनों हाथों से बलपूर्वक पकड़ लिया। वे बड़े जोर से गर्जना करते हुए समस्त योद्धाओं से बोले, 'आज दु:शासन की भुजा फटी जा रही है। वह अब प्राण त्यागना चाहता है। जिसमें भी शक्ति हो, वह आकर उसे मेरे हाथों से बचा ले।' इस प्रकार समस्त योद्धाओं को ललकारते हुए महाबली, महामनस्वी, कुपित भीमसेन ने एक ही हाथ से दु:शासन की भुजा बलपूर्वक फाड़ डाली। उसकी वह भुजा वज्र के समान कठोर थी। भीमसेन ने समस्त योद्धाओं के देखते-देखते उस भुजा से उसे पीटना आरम्भ कर दिया। | | | | Saying these words on the battlefield, Bhimasena climbed on the chest of Prince Dushasan and forcefully caught him with both hands and roared loudly and said to all the warriors, 'Today Dushasan's arm is being torn off. He now wants to give up his life. Whoever has strength, come and save him from my hands.' Challenging all the warriors in this manner, the mighty, great-minded, enraged Bhimasena forcefully tore off Dushasan's arm with just one hand. That arm of his was as hard as a thunderbolt. Bhimasena started beating him with that arm in the presence of all the warriors. | | ✨ ai-generated | | |
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