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श्लोक 8.82.d5-d6  |
दु:शासन उवाच
सर्वं स्मरे नैव च विस्मरामि
उदीर्यमाणं शृणु भीमसेन॥
स्मरामि चात्मप्रभवं चिराय
यज्जातुषे वेश्मनि रात्र्यहानि।
विश्वासहीना मृगयां चरन्तो
वसन्ति सर्वत्र निराकृतास्तु॥ |
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| अनुवाद |
| दु:शासन बोला- भीमसेन! मुझे सब कुछ याद है। मैं भूलता नहीं। मेरी बात सुनो। मैं जो कुछ कहता हूँ, वह मुझे बहुत समय तक याद रहता है। पहले तुम लोग दिन-रात लाक्षागृह में आशंकित रहते थे। फिर तुम्हें वहाँ से निकाल दिया गया और तुम जंगल में जगह-जगह शिकार करते हुए रहने लगे। |
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| Dushasan said- Bhimsen! I remember everything. I do not forget. Listen to what I say. I remember everything I say for a long time. Earlier you people used to live in Lakshagriha day and night with apprehension. Then you were thrown out from there and started living in the forest hunting everywhere. |
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