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श्लोक 8.82.36  |
स तेन निर्विद्धतनुर्वृकोदरो
निपातित: स्रस्ततनुर्गतासुवत्।
प्रसार्य बाहू रथवर्यमाश्रित:
पुन: स संज्ञामुपलभ्य चानदत्॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| भीमसेन का शरीर उससे छिद गया। वे अत्यन्त दुर्बल हो गए और अपने श्रेष्ठ रथ पर दोनों भुजाएँ फैलाकर इस प्रकार लुढ़क पड़े मानो प्राणहीन हो गए हों। फिर थोड़ी देर बाद भीमसेन को होश आया और वे सिंह के समान दहाड़ने लगे। |
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| Bhimasena's body was pierced by it. He became very weak and rolled down on his best chariot with both his arms spread out as if he was lifeless. Then after a little while Bhimasena regained consciousness and started roaring like a lion. |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि दु:शासनभीमसेनयुद्धे द्वॺशीतितमोऽध्याय:॥ ८२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें दु:शासन और भीमसेनका युद्धविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४४ १/२ श्लोक हैं।) |
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