श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 82: सात्यकिके द्वारा कर्णपुत्र प्रसेनका वध, कर्णका पराक्रम और दु:शासन एवं भीमसेनका युद्ध  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  8.82.35 
तत: शरं सूर्यमरीचिसप्रभं
सुवर्णवज्रोत्तमरत्नभूषितम्।
महेन्द्रवज्राशनिपातदु:सहं
मुमोच भीमाङ्गविदारणक्षमम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी, सोने और हीरे आदि बहुमूल्य रत्नों से विभूषित तथा इन्द्र के वज्र और बिजली के समान भयंकर तेज वाले दुःशासन ने भीमसेन के अंगों को काटने में समर्थ एक भयंकर बाण छोड़ा॥35॥
 
After this, Dushasana, who was as radiant as the sun's rays, adorned with precious gems like gold and diamonds, and as fierce as the thunderbolt and lightning of Lord Indra, released a fierce arrow which was capable of severing the limbs of Bhimasena. 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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