श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 82: सात्यकिके द्वारा कर्णपुत्र प्रसेनका वध, कर्णका पराक्रम और दु:शासन एवं भीमसेनका युद्ध  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  8.82.26 
समाततेनेष्वसनेन कूजता
भृशायतेनामितबाणवर्षिणा।
बभूव दुर्धर्षतर: स सात्यकि:
शरन्नभोमध्यगतो यथा रवि:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जैसे शरद ऋतु के आकाश के मध्य में मध्याह्न का सूर्य प्रज्वलित हो जाता है, उसी प्रकार उस समय सात्यकि का विशाल धनुष, जो असंख्य बाणों की वर्षा करता था और कानों को खींच लेने से घोर शब्द करता था, शत्रुओं के लिए उसे हराना अत्यन्त कठिन हो गया॥ 26॥
 
Just as the midday sun becomes blazing in the middle of the autumn sky, similarly Satyaki became extremely difficult to defeat for his enemies at that time because of his huge bow which showered innumerable arrows and which made a loud sound due to the ears being drawn.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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