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श्लोक 8.79.95  |
शरान्धकारे तु महात्मभि: कृते
महामृधे योधवरै: परस्परम्।
चतुर्दिशो वै विदिशश्च पार्थिव
प्रभा च सूर्यस्य तमोवृताभवत्॥ ९५॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! उस महायुद्ध में महाबुद्धिमान योद्धाओं ने एक-दूसरे पर बाण चलाकर अन्धकार फैला दिया था। चारों दिशाएँ, अन्तरदिशाएँ तथा सूर्य का तेज भी उस अन्धकार से आच्छादित हो गया था॥ 95॥ |
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| Maharaj! In that great war, the great warriors with great minds spread darkness by shooting arrows at each other. All the four directions, the sub-directions and even the radiance of the Sun were covered by that darkness.॥ 95॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनाशीतितमोऽध्याय:॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ९८ श्लोक हैं।) |
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