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mahabharat 8.78.29-31h: भरत! महाराज! मैंने अपनी आँखों से यह अद्भुत पराक्रम देखा है कि वीर सारथीपुत्र ने अकेले ही अपने बाणों से युद्धस्थल में पूरी शक्ति से युद्ध करने वाले पाण्डव पक्ष के धनुर्धरों को आगे बढ़ने से रोक दिया।   |   mahabharat अध्याय 8.78: कर्णके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार और पलायन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 78: कर्णके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार और पलायन  »  श्लोक 29-31h
 
 
श्लोक  8.78.29-31h 
एतदत्यद्भुतं कर्म दृष्टवानस्मि भारत॥ २९॥
यदेक: समरे शूरान् सूतपुत्र: प्रतापवान्।
यतमानान् परं शक्त्या योधयानांश्च धन्विन:॥ ३०॥
पाण्डवेयान् महाराज शरैर्वारितवान् रणे।
 
 
अनुवाद
भरत! महाराज! मैंने अपनी आँखों से यह अद्भुत पराक्रम देखा है कि वीर सारथीपुत्र ने अकेले ही अपने बाणों से युद्धस्थल में पूरी शक्ति से युद्ध करने वाले पाण्डव पक्ष के धनुर्धरों को आगे बढ़ने से रोक दिया।
 
Bharata! Maharaj! I have seen with my own eyes this wonderful feat that the valiant charioteer's son alone stopped the Pandava side's archers, who were fighting with all their might, from advancing in the battlefield with his arrows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)