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श्लोक 8.75.15  |
स तूत्तमौजा निशितै: पृषत्कै-
र्विव्याध खड्गेन च भास्वरेण।
पार्ष्णिं हयांश्चैव कृपस्य हत्वा
शिखण्डिवाहं स ततोऽध्यरोहत्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् उत्तमजय ने तीखे बाणों से कर्ण को घायल कर दिया और (जब कृपाचार्य ने उसे रोका) कृपाचार्य के पश्चरक्षकों और घोड़ों को चमकती हुई तलवार से मारकर वह शिखण्डी के रथ पर चढ़ गया। |
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| Then Uttamjay pierced Karna with sharp arrows and (when Krupacharya obstructed him) having slain Krupacharya's rear-guards and horses with a gleaming sword he mounted Shikhandi's chariot. |
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