श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 74: अर्जुनके वीरोचित उद्‍गार  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  8.74.58 
इत्येवमुक्त्वार्जुन एकवीर:
क्षिप्रं रिपुघ्न: क्षतजोपमाक्ष:।
भीमं मुमुक्षु: समरे प्रयात:
कर्णस्य कायाच्च शिरो जिहीर्षु:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
भगवान से ऐसा कहकर अतुलनीय वीर शत्रुघ्न अर्जुन क्रोध से लाल आँखें किए हुए भीमसेन को संकट से बचाने और कर्ण का सिर धड़ से अलग करने के लिए शीघ्रतापूर्वक युद्धभूमि से चले गए।
 
Having said this to the Lord, the incomparable hero Shatrughan Arjuna, his eyes turning red with anger, hurriedly left the battlefield to rescue Bhimasena from trouble and to separate Karna's head from his body.
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनवाक्ये चतु:स प्ततितमोऽध्याय:॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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