श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 74: अर्जुनके वीरोचित उद्‍गार  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  8.74.53-54 
भवत्सकाशे वक्ष्ये च पुनरेवात्मसंस्तवम्॥ ५३॥
धनुर्वेदे मत्समो नास्ति लोके
पराक्रमे वा मम कोऽस्ति तुल्य:।
को वाप्यन्यो मत्समोऽस्ति क्षमावां-
स्तथा क्रोधे सदृशोऽन्यो न मेऽस्ति॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
मैं पुनः तुमसे अपनी स्तुति कहता हूँ, धनुर्वेद में मुझसे समान गुण रखने वाला इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। फिर पराक्रम में मेरे समान कौन है? मेरे समान क्षमाशील कौन है और क्रोध में भी मेरे समान कोई नहीं है॥ 53-54॥
 
‘I once again tell you my praises, there is no one else in this world who can match me in Dhanur Veda. Then who is like me in valour? Who is as forgiving as me and there is no one like me in anger as well.॥ 53-54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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