श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 74: अर्जुनके वीरोचित उद्‍गार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  8.74.3 
त्वया नाथेन गोविन्द ध्रुव एव जयो मम।
प्रसन्नो यस्य मेऽद्य त्वं लोके भूतभविष्यकृत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
गोविन्द! चूँकि आप मेरे स्वामी और रक्षक हैं, अतः युद्ध में मेरी विजय निश्चित है। आप जगत के भूत और भविष्य के रचयिता हैं। जिस पर आप प्रसन्न हैं (अर्थात् मुझ पर) उसकी विजय में आज क्या संदेह है?॥3॥
 
‘Govind! Since you are my master and protector, then my victory in the war is certain. You are the creator of the past and future of the world. What doubt is there today about the victory of the one on whom you are pleased (i.e. me).॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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