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mahabharat 8.72.37: धनंजय! जिसकी संगति के कारण पापी दुर्योधन अपने को वीर समझता है, उसी सारथि का पुत्र कर्ण समस्त पापों का मूल है; अतः तुम्हें आज ही उसका वध करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 8.72: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 72: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  8.72.37 
आत्मानं मन्यते वीरं येन पाप: सुयोधन:।
तमद्य मूलं पापानां जहि सौतिं धनंजय॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
धनंजय! जिसकी संगति के कारण पापी दुर्योधन अपने को वीर समझता है, उसी सारथि का पुत्र कर्ण समस्त पापों का मूल है; अतः तुम्हें आज ही उसका वध करना चाहिए।
 
Dhananjaya! Because of whose company the sinner Duryodhan considers himself a hero, that charioteer's son Karna is the root of all sins; therefore you must kill him today.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)