श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 72: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 2-4h
 
 
श्लोक  8.72.2-4h 
कल्पतां मे रथो भूयो युज्यन्तां च हयोत्तमा:।
आयुधानि च सर्वाणि सज्जन्तां मे महारथे॥ २॥
उपावृत्ताश्च तुरगा: शिक्षिताश्चाश्वसादिभि:।
रथोपकरणै: सज्जा उपायान्तु त्वरान्विता:॥ ३॥
प्रयाहि शीघ्रं गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया।
 
 
अनुवाद
‘गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो जाए। उसमें पुनः श्रेष्ठ घोड़े जोत दिए जाएँ और सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र सजाकर मेरे विशाल रथ में रख दिए जाएँ। घुड़सवारों द्वारा प्रशिक्षित और सवार किए हुए घोड़े रथ-सम्बन्धी उपकरणों से सुसज्जित होकर शीघ्र ही यहाँ आ जाएँ और तुम सारथिपुत्र का वध करने की इच्छा से शीघ्र ही यहाँ से प्रस्थान करो।’॥ 2-3 1/2॥
 
‘Govind! Now my chariot should be ready. Let the best horses be harnessed to it again and let all kinds of weapons be decorated and kept in my huge chariot. The horses trained and ridden by the horsemen should come here soon, equipped with chariot related equipment and you should leave from here soon with the desire to kill the son of a charioteer.’॥ 2-3 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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