श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 71: अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  8.71.21-22 
एवमुक्त: प्रत्युवाच विजयो भरतर्षभ।
सत्येन ते शपे राजन् प्रसादेन तथैव च।
भीमेन च नरश्रेष्ठ यमाभ्यां च महीपते॥ २१॥
यथाद्य समरे कर्णं हनिष्यामि हतोऽपि वा।
महीतले पतिष्यामि सत्येनायुधमालभे॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहने पर अर्जुन ने कहा - 'हे राजन! हे पुरुषश्रेष्ठ राजन! मैं सत्य की शपथ लेकर, आपके कृपापात्र, भीमसेन की शपथ लेकर, नकुल और सहदेव की शपथ लेकर तथा सत्य शब्द से अपने धनुष को स्पर्श करके कहता हूँ कि आज युद्ध में या तो मैं कर्ण को मार डालूँगा या स्वयं मारा जाकर पृथ्वी पर गिर पड़ूँगा।'
 
O best of the Bharatas! On his saying this, Arjuna replied - 'O King! O best of men, king! I swear to you in the name of truth, in the name of your kind blessings, in the name of Bhimasena, as well as in the name of Nakula and Sahadeva, and by touching my bow with the word truth, I say that today in the battle I will either kill Karna or I will myself be killed and fall on the earth.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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