श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 71: अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  8.71.17-18 
कर्णेन मे महाबाहो सर्वसैन्यस्य पश्यत:॥ १७॥
कवचं च ध्वजं चैव धनु: शक्तिर्हया: शरा:।
शरै: कृत्ता महेष्वास यतमानस्य संयुगे॥ १८॥
 
 
अनुवाद
महाधनुर्धर! महाबाहो! मैं अपनी पूरी शक्ति से युद्ध में लगा हुआ था, किन्तु सारी सेना के देखते ही देखते कर्ण ने अपने बाणों से मेरे कवच, ध्वजा, धनुष, भाला, घोड़े और बाणों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया।॥17-18॥
 
Mahadhanurdhar! Mahabaho! I was engaged in the battle with all my might, but in front of the whole army, Karna has with his arrows cut my armour, flag, bow, spear, horse and arrows into pieces.'॥ 17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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