श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक  8.70.59-60 
भवन्तं नाथमासाद्य ह्यावां व्यसनसागरात्।
घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ॥ ५९॥
त्वद्‍बुद्धिप्लवमासाद्य दु:खशोकार्णवाद् वयम्।
समुत्तीर्णा: सहामात्या: सनाथा: स्म त्वयाच्युत॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
आज आपको रक्षकरूप में पाकर हम दोनों ने कष्टों के भयंकर समुद्र को पार कर लिया है। हम दोनों ही अज्ञान के कारण मोहग्रस्त हो रहे थे; किन्तु आपकी ज्ञानरूपी नौका का आश्रय लेकर हम अपने मंत्रियों सहित शोकरूपी समुद्र को पार कर गए हैं। अच्युत! हम लोग केवल आपके द्वारा ही रक्षित हैं।॥59-60॥
 
‘Today, having found you as our protector, we both have crossed the dreadful sea of ​​troubles. Both of us were being deluded by ignorance; but taking shelter in the boat of your wisdom, we have crossed the sea of ​​sorrow and grief along with our ministers. Achyuta! We are protected only by you.'॥ 59-60॥
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरसमाश्वासने सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७०॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)