श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  8.70.57-58 
एवमेव यथाऽऽत्थ त्वमस्त्येषोऽतिक्रमो मम॥ ५७॥
अनुनीतोऽस्मि गोविन्द तारितश्चास्मि माधव।
मोचिता व्यसनाद् घोराद् वयमद्य त्वयाच्युत॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
गोविन्द! आपकी बात ठीक है। वास्तव में मैंने इस नियम का उल्लंघन किया है। माधव! आपने मुझे अपने अनुनय से संतुष्ट किया है और संकटों के सागर में डूबने से बचाया है। अच्युत! आज आपके द्वारा हम एक महान विपत्ति से बच गए हैं।
 
‘Govind! What you say is correct. In fact I have violated this rule. Madhava! You have satisfied me by your persuasion and saved me from drowning in the sea of ​​troubles. Achyuta! Today we have been saved from a great calamity by you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)