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mahabharat 8.70.56-57h: भगवान श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने शीघ्रता से अपने चरणों में लेटे हुए हृषिकेश को उठाया और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा -   |   mahabharat अध्याय 8.70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 56-57h
 
 
श्लोक  8.70.56-57h 
इति कृष्णवच: श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिर:।
ससम्भ्रमं हृषीकेशमुत्थाप्य प्रणतं तदा॥ ५६॥
कृताञ्जलिस्ततो वाक्यमुवाचानन्तरं वच:।
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने शीघ्रता से अपने चरणों में लेटे हुए हृषिकेश को उठाया और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा -
 
On hearing these words of Lord Krishna, Dharmaraja Yudhishthira swiftly picked up Hrishikesh who was lying at his feet and with folded hands said this -
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)