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mahabharat 8.70.47-48: वीर! भीमसेन को राजा होना चाहिए। आज इतना अपमानित होने के बाद मुझे जीवित रहने की आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर सहसा ही शैय्या छोड़कर वहाँ से नीचे कूद पड़े और वन जाने की इच्छा करने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके चरणों में प्रणाम करके यह कहा।   |   mahabharat अध्याय 8.70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  8.70.47-48 
भीमोऽस्तु राजा मम जीवितेन
न कार्यमद्यावमतस्य वीर।
इत्येवमुक्त्वा सहसोत्पपात
राजा ततस्तच्छयनं विहाय॥ ४७॥
इयेष निर्गन्तुमथो वनाय
तं वासुदेव: प्रणतोऽभ्युवाच॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
वीर! भीमसेन को राजा होना चाहिए। आज इतना अपमानित होने के बाद मुझे जीवित रहने की आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर सहसा ही शैय्या छोड़कर वहाँ से नीचे कूद पड़े और वन जाने की इच्छा करने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके चरणों में प्रणाम करके यह कहा।
 
Valiant! Bhimsena should be the king. After being insulted so much today, I do not need to live.' Saying this, King Yudhishthira suddenly left the bed and jumped down from there and started wishing to go to the forest. Then Lord Krishna bowed at his feet and said this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)