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mahabharat 8.70.43-44: कुन्तीनन्दन! मैंने निश्चय ही कोई पुण्य कर्म नहीं किया है, जिसके कारण आपको इतना भयंकर संकट सहना पड़ा है। मैं पापी, कुल का नाश करने वाला, पापकर्मों में आसक्त, मंदबुद्धि, आलसी और कायर हूँ; अतः आज आप मेरा सिर काट डालें।   |   mahabharat अध्याय 8.70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  8.70.43-44 
कृतं मया पार्थ यथा न साधु
येन प्राप्तं व्यसनं व: सुघोरम्॥ ४३॥
तस्माच्छिरश्छिन्धि ममेदमद्य
कुलान्तकस्याधमपूरुषस्य।
पापस्य पापव्यसनान्वितस्य
विमूढबुद्धेरलसस्य भीरो:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! मैंने निश्चय ही कोई पुण्य कर्म नहीं किया है, जिसके कारण आपको इतना भयंकर संकट सहना पड़ा है। मैं पापी, कुल का नाश करने वाला, पापकर्मों में आसक्त, मंदबुद्धि, आलसी और कायर हूँ; अतः आज आप मेरा सिर काट डालें।
 
‘Kuntinandan! I have definitely not done any good deed, due to which you have faced such a terrible problem. I am a sinner, a destroyer of the family, addicted to sinful vices, dull-witted, lazy and coward; therefore, today you cut off my head.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)