श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  8.70.38-39 
संजय उवाच
इत्येवमुक्त्वा पुनरेव पार्थो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम्।
विमुच्य शस्त्राणि धनुर्विसृज्य
कोशे च खड्गं विनिधाय तूर्णम्॥ ३८॥
स व्रीडया नम्रशिरा: किरीटी
युधिष्ठिरं प्राञ्जलिरभ्युवाच।
प्रसीद राजन् क्षम यन्मयोक्तं
काले भवान् वेत्स्यति तन्नमस्ते॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं - महाराज! किरीटधारी कुन्तीपुत्र अर्जुन ने धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर से ऐसा कहकर अपने शस्त्र उतार दिए, धनुष नीचे रख दिया और तत्काल तलवार म्यान में रख ली तथा लज्जा से झुककर हाथ जोड़कर उनसे पुनः कहा - 'राजन्! आप प्रसन्न हों। मैंने जो कुछ कहा है, उसके लिए मुझे क्षमा करें। समय आने पर आपको सब कुछ ज्ञात हो जाएगा। इसलिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ।'
 
Sanjaya says - Maharaj! Arjuna, the son of Kunti, who wore a crown, after saying this to Yudhishthira, the best of the righteous, took off his weapons, put down his bow and immediately put his sword back in the sheath and bowing down in shame, with folded hands, said to him again - 'King! May you be happy. Please forgive me for whatever I have said. You will come to know everything in time. That is why I salute you.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)