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mahabharat 8.70.31-32h: हे राजन! मैंने समस्त दिशाओं और दिक्पालों को जीतकर उन्हें आपके अधीन कर दिया था। प्रचुर दक्षिणा सहित राजसूय यज्ञ का आयोजन तथा आपकी दिव्य सभा का निर्माण मेरे ही बल से संभव हुआ था।   |   mahabharat अध्याय 8.70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  8.70.31-32h 
मया हि राजन् सदिगीश्वरा दिशो
विजित्य सर्वा भवत: कृता वशे॥ ३१॥
स राजसूयश्च समाप्तदक्षिण:
सभा च दिव्या भवतो ममौजसा।
 
 
अनुवाद
हे राजन! मैंने समस्त दिशाओं और दिक्पालों को जीतकर उन्हें आपके अधीन कर दिया था। प्रचुर दक्षिणा सहित राजसूय यज्ञ का आयोजन तथा आपकी दिव्य सभा का निर्माण मेरे ही बल से संभव हुआ था।
 
‘O King! I had conquered all the directions and Dikpalas and made them subservient to you. The performance of the Rajasuya Yagna with ample Dakshinas and the construction of your divine assembly was possible only due to my strength.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)