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mahabharat 8.70.3-7: जो समय आने पर शत्रुओं को संताप देते हुए उन समस्त वीर राजाओं, प्रधान रथियों, श्रेष्ठ हाथियों, प्रमुख घुड़सवारों, असंख्य योद्धाओं, एक हजार से अधिक हाथियों, दस हजार कम्बोज घोड़ों और पर्वतीय योद्धाओं को युद्धस्थल में मार डालते हैं तथा मृगों को मारकर सिंह की भांति गर्जना करते हैं, वे वीर भीमसेन जो हाथ में गदा लेकर रथ से कूद पड़ते हैं और उससे युद्धस्थल में हाथी, घोड़े और रथियों को मार डालते हैं तथा ऐसा कठिन पराक्रम दिखा रहे हैं, जिसे तुम कभी नहीं कर सकते, जिनका पराक्रम इंद्र के समान है, जो श्रेष्ठ तलवार, चक्र और धनुष से हाथियों, घोड़ों, पैदल योद्धाओं और अन्य शत्रुओं को जला डालते हैं तथा जो अपने पैरों और दोनों हाथों से शत्रुओं को कुचलकर उनका नाश करते हैं, वे कुबेर और यमराज के समान पराक्रमी तथा शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक मार डालने में समर्थ महाबली भीमसेन ही मेरे एकमात्र शत्रु हैं। तुम मेरी निन्दा नहीं कर सकते, क्योंकि तुम सदैव अपने पराक्रम से नहीं, अपितु अपने हितैषी मित्रों द्वारा ही सुरक्षित रहते हो। 3-7   |   mahabharat अध्याय 8.70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 3-7
 
 
श्लोक  8.70.3-7 
काले हि शत्रून् परिपीडॺ संख्ये
हत्वा च शूरान् पृथिवीपतींस्तान्।
रथप्रधानोत्तमनागमुख्यान्
सादिप्रवेकानमितांश्च वीरान्॥ ३॥
य: कुञ्जराणामधिकं सहस्रं
हत्वा नदंस्तुमुलं सिंहनादम्।
काम्बोजानामयुतं पर्वतीयान्
मृगान् सिंहो विनिहत्येव चाजौ॥ ४॥
सुदुष्करं कर्म करोति वीर:
कर्तुं यथा नार्हसि त्वं कदाचित् ।
रथादवप्लुत्य गदां परामृशं-
स्तया निहन्त्यश्वरथद्विपान् रणे॥ ५॥
वरासिना चापि नराश्वकुञ्जरां-
स्तथा रथाङ्गैर्धनुषा दहत्यरीन्।
प्रमृद्य पद्‍भ्यामहितान् निहन्ति
पुनस्तु दोर्भ्यां शतमन्युविक्रम:॥ ६॥
महाबलो वैश्रवणान्तकोपम:
प्रसह्य हन्ता द्विषतामनीकिनीम्।
स भीमसेनोऽर्हति गर्हणां मे
न त्वं नित्यं रक्ष्यसे य: सुहृद्भि:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो समय आने पर शत्रुओं को संताप देते हुए उन समस्त वीर राजाओं, प्रधान रथियों, श्रेष्ठ हाथियों, प्रमुख घुड़सवारों, असंख्य योद्धाओं, एक हजार से अधिक हाथियों, दस हजार कम्बोज घोड़ों और पर्वतीय योद्धाओं को युद्धस्थल में मार डालते हैं तथा मृगों को मारकर सिंह की भांति गर्जना करते हैं, वे वीर भीमसेन जो हाथ में गदा लेकर रथ से कूद पड़ते हैं और उससे युद्धस्थल में हाथी, घोड़े और रथियों को मार डालते हैं तथा ऐसा कठिन पराक्रम दिखा रहे हैं, जिसे तुम कभी नहीं कर सकते, जिनका पराक्रम इंद्र के समान है, जो श्रेष्ठ तलवार, चक्र और धनुष से हाथियों, घोड़ों, पैदल योद्धाओं और अन्य शत्रुओं को जला डालते हैं तथा जो अपने पैरों और दोनों हाथों से शत्रुओं को कुचलकर उनका नाश करते हैं, वे कुबेर और यमराज के समान पराक्रमी तथा शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक मार डालने में समर्थ महाबली भीमसेन ही मेरे एकमात्र शत्रु हैं। तुम मेरी निन्दा नहीं कर सकते, क्योंकि तुम सदैव अपने पराक्रम से नहीं, अपितु अपने हितैषी मित्रों द्वारा ही सुरक्षित रहते हो। 3-7
 
The one who, while tormenting the enemies in due time, kills all those valiant kings, chief charioteers, best elephants, chief horsemen, innumerable warriors, more than a thousand elephants, ten thousand Kamboja horses and mountain warriors in the battlefield and roars like a lion roars after killing deer, the brave Bhimasena who jumps from the chariot with a mace in his hand and kills elephants, horses and chariots in the battlefield with it and is displaying such a difficult feat which you can never do, whose valour is equal to that of Indra, who burns elephants, horses, foot-fighters and other enemies with the best sword, discus and bow and who destroys the enemies by crushing them with his feet and with both hands, that mighty Bhimasena, as valiant as Kubera and Yamaraja and capable of killing the army of enemies with force, is my only enemy. You cannot criticize me because you are always protected not by your own prowess but by your well wishing friends. 3-7
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)