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mahabharat 8.70.10: समय पर जुते हुए रथ पर आरूढ़ होकर वीर भीमसेन ने धनुष को खींचकर मुट्ठी भर बाण निकाले और जैसे बादल जल की धाराएँ बरसाते हैं, उसी प्रकार उन्होंने इस महायुद्ध में बाणों की वर्षा की।   |   mahabharat अध्याय 8.70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  8.70.10 
स युक्तमास्थाय रथं हि काले
धनुर्विधुन्वन् शरपूर्णमुष्टि:।
सृजत्यसौ शरवर्षाणि वीरो
महाहवे मेघ इवाम्बुधारा:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
समय पर जुते हुए रथ पर आरूढ़ होकर वीर भीमसेन ने धनुष को खींचकर मुट्ठी भर बाण निकाले और जैसे बादल जल की धाराएँ बरसाते हैं, उसी प्रकार उन्होंने इस महायुद्ध में बाणों की वर्षा की।
 
Mounted on the chariot yoked in due time, the valiant Bhimasena, swinging his bow, took out a handful of arrows and, just as the clouds pour down torrents of water, in the same manner he showered arrows in this great war.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)