श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 69: युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  8.69.87 
वधं ह्ययं पाण्डव धर्मराज-
स्त्वत्तोऽयुक्तं वेत्स्यते चैवमेष:।
ततोऽस्य पादावभिवाद्य पश्चात्
समं ब्रूया: सान्त्वयित्वा च पार्थम्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुपुत्र! तुम्हारे द्वारा कहे गए इस अनुचित वचन को सुनकर धर्मराज अपने को मरा हुआ समझेंगे। इसके बाद तुम उनके चरणों में प्रणाम करो, उन्हें सान्त्वना दो, क्षमा मांगो और उनसे उचित वचन बोलो॥87॥
 
Son of Pandu! On hearing this inappropriate use of words by you, Dharamraj will consider himself dead. After this, you should bow down to his feet, console him, ask for forgiveness and speak just words to him. ॥ 87॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)