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mahabharat 8.69.64-65h: जहाँ तक हो सके, उन लुटेरों को किसी भी प्रकार धन नहीं देना चाहिए; क्योंकि पापियों को दिया गया धन देने वाले को भी दुःख पहुँचाता है।   |   mahabharat अध्याय 8.69: युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 69: युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना  »  श्लोक 64-65h
 
 
श्लोक  8.69.64-65h 
न च तेभ्यो धनं देयं शक्ये सति कथंचन॥ ६४॥
पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत्।
 
 
अनुवाद
जहाँ तक हो सके, उन लुटेरों को किसी भी प्रकार धन नहीं देना चाहिए; क्योंकि पापियों को दिया गया धन देने वाले को भी दुःख पहुँचाता है।
 
As far as possible, one should not give money to those robbers in any way; because money given to sinners causes pain to the giver as well. 64 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)