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mahabharat 8.69.56: परंतु मैं इन दोनों मतों से तुम्हें दोष नहीं देता; परंतु समस्त धार्मिक क्रियाएँ केवल वेदों से ही संचालित नहीं होतीं; इसीलिए धर्मज्ञ ऋषियों ने समस्त जीवों के उत्थान और निःस्वार्थता के लिए उत्तम धर्म का प्रतिपादन किया है ॥56॥   |   mahabharat अध्याय 8.69: युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 69: युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  8.69.56 
तत् ते न प्रत्यसूयामि न च सर्वं विधीयते।
प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
परंतु मैं इन दोनों मतों से तुम्हें दोष नहीं देता; परंतु समस्त धार्मिक क्रियाएँ केवल वेदों से ही संचालित नहीं होतीं; इसीलिए धर्मज्ञ ऋषियों ने समस्त जीवों के उत्थान और निःस्वार्थता के लिए उत्तम धर्म का प्रतिपादन किया है ॥56॥
 
But I do not blame you on these two opinions; But all religious activities are not governed by the Vedas alone; That is why religious sages have propounded the best religion for the upliftment and selflessness of all living beings. 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)