श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 69: युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  8.69.17 
न हि धर्मविभागज्ञ: कुर्यादेवं धनंजय।
यथा त्वं पाण्डवाद्येह धर्मभीरुरपण्डित:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र धनंजय! जो धर्म का भेद जानता है, वह भी आज जो तुम करना चाहते हो, वह कभी नहीं कर सकता। वास्तव में तुम धर्मभीरु होने के साथ-साथ मूर्ख भी हो॥ 17॥
 
O son of Pandu, Dhananjaya! One who knows the ins and outs of Dharma can never do what you want to do here today. In reality, besides being a Dharma-fearing person, you are also foolish.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)