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mahabharat 8.68.3: पार्थ! कुन्ती के गर्भ में रहते हुए भी तुमने अपने भाई के प्रति ऐसा स्नेह दिखाया, जिसे कोई अच्छा नहीं कह सकता; क्योंकि जब तुम सारथिपुत्र कर्ण को मारने में समर्थ नहीं हुए, तब तुम भीमसेन को युद्धभूमि में अकेला छोड़कर वहाँ से चले गये।   |   mahabharat अध्याय 8.68: युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 68: युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  8.68.3 
स्नेहस्त्वया पार्थ कृत: पृथाया
गर्भं समाविश्य यथा न साधु।
त्यक्त्वा रणे यदपाया: स भीमं
यन्नाशक: सूतपुत्रं निहन्तुम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! कुन्ती के गर्भ में रहते हुए भी तुमने अपने भाई के प्रति ऐसा स्नेह दिखाया, जिसे कोई अच्छा नहीं कह सकता; क्योंकि जब तुम सारथिपुत्र कर्ण को मारने में समर्थ नहीं हुए, तब तुम भीमसेन को युद्धभूमि में अकेला छोड़कर वहाँ से चले गये।
 
Partha! Even while living in Kunti's womb, you showed such affection towards your own brother which no one can call good; because when you were not able to kill charioteer's son Karna, then you left Bhimasena alone on the battlefield and went away from there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)