Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 8.68.21-22h: पार्थ! यदि आपका पुत्र अभिमन्यु, जो पराक्रमियों में श्रेष्ठ और श्रेष्ठ सारथी है, जीवित होता, तो वह शत्रुओं का अवश्य ही संहार कर देता। तब मुझे युद्धभूमि में ऐसा अपमान न सहना पड़ता। यदि घटोत्कच भी युद्धभूमि में जीवित होता, तो मुझे वहाँ से मुँह मोड़कर भागना न पड़ता। | mahabharat अध्याय 8.68: युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन । mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यदि स्म जीवेत् स भवेन्निहन्ता
महारथानां प्रवरो रथोत्तम:।
तवाभिमन्युस्तनयोऽद्य पार्थ
न चास्मि गन्ता समरे पराभवम्॥ २१॥
अथापि जीवेत् समरे घटोत्कच-
स्तथापि नाहं समरे पराङ्मुख:।
अनुवाद
पार्थ! यदि आपका पुत्र अभिमन्यु, जो पराक्रमियों में श्रेष्ठ और श्रेष्ठ सारथी है, जीवित होता, तो वह शत्रुओं का अवश्य ही संहार कर देता। तब मुझे युद्धभूमि में ऐसा अपमान न सहना पड़ता। यदि घटोत्कच भी युद्धभूमि में जीवित होता, तो मुझे वहाँ से मुँह मोड़कर भागना न पड़ता।
Partha! If your son Abhimanyu, the best among the mighty warriors and the best charioteer, had been alive, he would have surely killed the enemies. Then I would not have to bear such humiliation in the battlefield. Even if Ghatotkacha had been alive in the battlefield, I would not have had to turn my face and run away from there. 21/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥